
आयु: सर्वाक्षसामग्री बुद्धि: साध्वी प्रशान्तता ।
यत्स्यात्तत्काकतालीयं मनुष्यत्वेऽपि देहिनाम् ॥5॥
अन्वयार्थ : जीवों के देश, जाति, कुलादि सहित मनुष्यपना होते हुए भी दीर्घायु, पाँचों इन्द्रियों की पूर्ण सामग्री, विशिष्ट तथा उत्तम बुद्धि, शीतल मंद कषायरूप परिणामों का होना काकतालीयन्याय के समान दुर्लभ जानना चाहिये ॥५॥
*जैसे किसी समय ताल का फल पक कर गिरे और उस ही समय काक का आना हो एवं वह उस फल को आकाश में ही पाकर खाने लगे। ऐसा योग मिलना अत्यन्त कठिन है ।
वर्णीजी