
नरत्वं यद्गुणोपेतं देशजात्यादिलक्षितम् ।
प्राणिन: प्राप्नुवन्त्यत्र तन्मन्ये कर्मलाघवात् ॥4॥
अन्वयार्थ : ये प्राणीगण संसार में मनुष्यपना और उसमें गुणसहितपना तथा उत्तम देश, जाति, कुल आदि साहित्य उत्तरोत्तर कर्मों के क्षय से पाते हैं । ये बहुत दुर्लभ हैं, ऐसा मैं मानता हूँ ॥४॥
वर्णीजी