मार्गमासाद्य केचिच्च सम्यग्रत्नत्रयात्मकम् ।
त्यजन्ति गुरुमिथ्यात्वविषव्यामूढचेतस: ॥8॥
अन्वयार्थ : कोई-कोई सम्यक् रत्नत्रय मार्ग को पाकर भी तीव्र-मिथ्यात्वरूप विष से व्यामूढ़ चित्त होते हुए सम्यग्मार्ग को छोड़ देते हैं । गृहीत मिथ्यात्व बड़ा बलवान है, जो उत्तम मार्ग मिले तो उसको भी छुड़ा देता है ॥८॥

  वर्णीजी