
स्वयं नष्टो जन: कश्चित्कश्चिन्नष्टैश्च नाशित: ।
कश्चित्प्रच्यवते मार्गाच्चण्डपाषण्डशासनै: ॥9॥
अन्वयार्थ : कोई-कोई तो सम्यग्मार्ग से आप ही नष्ट हो जाते हैं । कोई अन्य मार्ग से च्युत हुए मनुष्यों के द्वारा नष्ट किये जाते हैं और कोई-कोई प्रचंड पाखंडियों के उपदेशे हुए मतों को देखकर मार्ग से च्युत हो जाते हैं ॥९॥
वर्णीजी