
अविचारितरम्याणि शासनान्यसतां जनै: ।
अधमान्यपि सेव्यन्ते जिह्वोपस्थादिदण्डितै: ॥11॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष जिह्वा तथा उपस्थादि इन्द्रियों से दंडित हैं, वे अविचार से रमणीक भासने वाले दुष्टों के चलाए हुए अधम मतों को भी सेवन करते हैं । विषयकषाय क्या-क्या अनर्थ नहीं कराते ? ॥११॥
वर्णीजी