
त्यक्त्वा विवेकमाणिक्यं सर्वाभिमतसिद्धिदम् ।
अविचारितरम्येषु पक्षेष्वज्ञ: प्रवत्र्तते ॥10॥
अन्वयार्थ : जो मार्ग से च्युत अज्ञानी है वह समस्त मनोवांछित सिद्धि के देने वाले विवेकरूपी चिन्तामणि रत्न को छोड़कर बिना विचार के रमणीक भासने वाले पक्षों में प्रवृत्ति करने लग जाता है॥१०॥
वर्णीजी