(मालिनी)
सुलभमिह समस्तं वस्तुजातं जगत्या-
मुरगसुरनरेन्द्रै: प्रार्थितं चाधिपत्यम्
कुलबलसुभगत्वोद्दामरामादि चान्यत्
किमुत तदिदमेवं दुर्लभं बोधिरत्नम् ॥13॥
अन्वयार्थ : इस जगत में (त्रैलोक में) समस्त द्रव्यों का समूह सुलभ है तथा धरणीन्द्र, नरेन्द्र, सुरेन्द्रों द्वारा प्रार्थना करने योग्य अधिपतिपना भी सुलभ है क्योंकि ये सब ही कर्मों के उदय से मिलते हैं तथा उत्तम कुल, बल, सुभगता, सुन्दर स्त्री आदिक समस्त पदार्थ सुलभ हैं; किन्तु जगत्प्रसिद्ध सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूप बोधिरत्न अत्यन्त दुर्लभ है। इस प्रकार बोधिदुर्लभभावना का व्याख्यान पूर्ण किया ॥२३॥
(दोहा)
बोधि आपका भाव है, निश्चय दुर्लभ नाहिं ।
भव में प्रापति कठिन है, यह व्यवहार कहाहिं ॥१२॥

  वर्णीजी