वर्णीजी
दीव्यन्नाभिरयं ज्ञानी भावनाभिर्निरन्तरम् ।
इहैवाप्नोत्यनातङ्कं सुखमत्यक्षमक्षयम् ॥1॥
अन्वयार्थ :
इन बारह भावनाओं से निरन्तर रमते हुए ज्ञानीजन इसी लोक में रोगादिक की बाधारहित अतीन्द्रिय अविनाशी सुख
(केवलज्ञानानन्द)
को पाते हैं ॥१॥
वर्णीजी