+ आगे प्रत्यक्ष काय विनय चार गाथाओं द्वारा कहते हैं - -
अब्भुट्ठाणं किदियम्मं णवणं अंजली य मुंडाणं ।
पच्चुग्गच्छणमेते पच्छिदस्स अणुसाधणं चेव॥124॥
अभ्युत्थान1 तथा कृतिकर्म2 नमन3 शिरोनति4 जोड़े हाथ ।
प्रत्युद्गमन5 तथा गुरु के पीछे कुछ दूरी पर चलना॥124॥

  सदासुखदासजी