पं-सदासुखदासजी
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आगे तीन गाथाओं द्वारा विनय का माहात्म्य प्रगट करते हैं-
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विणओ मोक्खोद्दारं विणयादो संजमो तवो णाणं ।
विणयेणाराहिज्जइ आयरिओ सव्वसंघो य॥134॥
विनय मोक्ष का द्वार कहा संयम-तप ज्ञान विनय से हों ।
सर्व संघ आचार्य विनय से ही निज-वश में होते हैं॥134॥
सदासुखदासजी