
विणयेण विप्पहूणस्स हवदि सिक्खा णिरत्थिया सव्वा ।
विणओ सिक्खाए फलं विणयफलं सव्वकल्लाणं॥133॥
विनय रहित साधु की सब शिक्षा कहलाती है निष्फल ।
शिक्षा का फल विनय जानना सब कल्याण विनय का फल॥133॥
अन्वयार्थ : विनय रहित के लिए सर्व शिक्षा निरर्थर्क होती है । शिक्षा पाने का फल तो विनय रूप प्रवर्तना है और विनय का सर्व फल कल्याण है । स्वर्गलोक, अहमिन्द्र लोक और निर्वाण प्राप्त होना, यह सर्व विनय का ही फल है ।
सदासुखदासजी