
कित्ती मित्ती माणस्स भंजणं गुरुजणे य बहुमाणे ।
तित्थयराणं आणा गुणाणुमोदो य विणयगुणा॥136॥
कीर्ति, मित्रता, गुरु बहुमान, और मान का होता नाश ।
तीर्थंकर की आज्ञा पालन गुण अनुमोदन विनय-निधान॥136॥
अन्वयार्थ : यह विनय मोक्ष का द्वार है । जिसने विनय धर्म में प्रवर्तन किया, उसने मोक्षद्वार में प्रवेश किया । विनय से संयम होता है, विनय से तप होता है, विनय से ज्ञान होता है और विनय से ही आचार्य की आराधना होती है, विनय से ही सर्व संघ की आराधना होती है । सर्वसंघ की विनय करना ही सर्व संघ की आराधना है और आचार-शास्त्रों में जो प्रायश्चित्तादि गुणों का प्ररूपण है, उसका प्रकाशन भी विनय से ही होता है तथा आत्मविशुद्धि भी अभिमान के अभाव रूप विनय से ही होती है ।
विनयवान के एक भी संक्लेश/कलह प्राप्त नहीं होता । विनयवंत के आर्जव गुण प्रगट होता है, विनयवंत के मार्दव/कोमलभाव भी प्रगट होता है और विनयवान ही गुणों में अनुरागरूप भक्ति को प्राप्त होता है । अविनयी को पूज्य पुरुषों के गुणों को सुनकर भी ईर्ष्या का भाव उत्पन्न होता है, तब भक्ति कहाँ से होगी? अत: अभिमानी के भक्ति नहीं होती ।
आचार्य में जिसने अपना सर्वस्व अर्पण किया है, वह तो भगवान/गुरु जैसी आज्ञा करते हैं; वैसा ही बोलना, चलना, बैठना, सोना, खाना, पढना, रहना । हमारा आत्मा ही आचार्य के आधीन है, ऐसी गुरुओं की आज्ञा का विनय करने वाला, उसमें लघुता अर्थात् भार रहितपना भी होता है । विनयवान ही गुरुजनों को आनन्दित करता है, अत: प्रह्लादकरण गुण भी विनय से ही होता है । यह विनयवान है, उद्धत नहीं, हठी नहीं । इसप्रकार विनय से ही जगत में कीर्ति विस्तरती/फैलती है और जो विनयवंत होता है, उसका जगत मित्र हो जाता है । विनयवान को दु:ख हो, ऐसा कोई भी नहीं चाहता । विनयवान के ही मान का अभाव होता है । गुरु ज्ञान में अधिक, तप में अधिक, चारित्र में अधिक, दीक्षा में अधिक , इन सभी का विनयवान ही बहुत मान, सत्कार, स्तवन करते हैं । विनयधर्म से जो रहित है, वह उपकारी गुरुजनों का उपकार लोप करके अहंकारी होता हुआ गुरुओं की अवज्ञा - निन्दा करता हैऔर ज्ञान का मूल, चारित्र का मूल भगवान तीर्थंकर देव ने विनय को ही कहा है । जिसने विनय अंगीकार/धारण की, उसने तीर्थंकरों की आज्ञापालन की और जिसे गुणों के प्रति आनंद होगा, वही गुणवानों की विनय करेगा ।
सदासुखदासजी