+ आगे समाधि नामक पाँचवाँ अधिकार दश गाथाओं द्वारा कहते हैं- -
चित्तं समाहिदं जस्स होज्ज वज्जिदविसोत्तियं वसियं ।
सो वहदि णिरदिचारं सामण्णधुरं अपरिसंतो॥137॥
जिसका चित्त समाहित1 होता, निज वश और अशुभ से हीन ।
निरतिचार धारण करता श्रामण्य धुरा2 वह क्लेश विहीन॥137॥
अन्वयार्थ : जिसका मन चलाचल है, उससे चारित्र का पालन नहीं होता है ।

  सदासुखदासजी