पं-सदासुखदासजी
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यदि गुरु ही आचारवान न हों तो इतने दोष प्रगट होते हैं-
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सेज्जोवधिसंथारं भत्तं पाणं च चयणकप्पगदो ।
उवकप्पिज्ज असुद्धं पडिचरए वा असंविग्गे॥430॥
दूषित वसति उपकरण संस्तर भक्तपान उपकल्प1 करे ।
दोषयुक्त आचार्य असंवेगी परिचारक युक्त करे2॥430॥
सदासुखदासजी