पंचविधे आचारे समुज्जदो सव्वसमिदचेट्ठाओ ।
सो उज्जमेदि खवयं पंचविधे सुट्ठु आयारे॥429॥
पंचाचार परायण अरु जिनकी सम्यक् सब चेष्टायें ।
वे आचार्य क्षपक को भी इन आचारों से युक्त करें॥429॥
अन्वयार्थ : जो आचार्य दर्शनाचार, ज्ञानाचार, चारित्राचार, तपाचार तथा वीर्याचार - इन पंच प्रकार के आचार में स्वयं उद्यमी रहते हैं और जिनकी चेष्टा/सम्पूर्ण प्रवृत्ति, वह समिति रूप होती है, यत्नाचार रूप हो, वे ही आचार्य क्षपक को पंच प्रकार के आचार में उद्यम कराते, प्रवृत्ति कराते हैं और यदि स्वयं ही हीनाचारी हों तो अन्य शिष्यों को शुद्ध आचार प्रवर्तन कराने में असमर्थ रहते हैं । इसलिए आचारवान गुरु की ही शरण ग्रहण करना श्रेष्ठ है ।

  सदासुखदासजी