
ण करेज्ज सारणं वारणं च खवयस्स चयणकप्पगदो ।
उद्देज्ज वा महल्लं खवयस्स वि किंचणारंभं॥432॥
कल्पच्युत3 आचार्य क्षपक का सारण4 वारण5 कर न सके ।
तथा क्षपक से बहु-आरम्भ करा उत्पन्न उद्वेग करे॥432॥
अन्वयार्थ : पंचाचार से हीन की संगति भी धर्म बिगाड कर संसार परिभ्रमण कराती है ।
सदासुखदासजी