आयारत्थो पुण से दोसे सव्वे वि ते विवज्जेदि ।
तम्हा आयारत्यो णिज्जवओ होदि आयरिओ॥433॥
आचारवान आचार्य सभी दोषों का नित परिहार करें ।
गुण-प्रवृत्त अरु दोष-विरत आचारवान निर्यापक हों॥433॥

  सदासुखदासजी