
सुदिपाणयेण अणुसट्ठिभोयणेण य पुणो उवग्गहिदो ।
तण्हाछुहाकिलंतो वि होदि झाणे अवक्खित्तो॥442॥
निर्यापक के वचनामृत जल, शिक्षारूपी भोजन से ।
क्षुधा-तृषा से पीड़ित फिर भी आत्मध्यान में स्थिर हो॥442॥
अन्वयार्थ : सर्व ही संसारी जीव आहारमय हैं, आहार से जीते हैं, आहार की ही निरन्तर वांछा करते हैं और रोग के वश से या त्याग कर देने से आहार छूट जाये या घट जाये, तब आर्तध्यान करके दु:ख से पीडित होने से ज्ञान में तथा चारित्र में नहीं रमते हैं और जिनसूत्र के आधार के धारक जो गुरु, वे श्रुतिरूप पान कराके और शिक्षारूप भोजन कराके साधु का उपकार करते हैं तो क्षुधा की तथा तृषा की पीडा सहित भी साधु ध्यान में विक्षेप/विघ्न रहित होता है ।
सदासुखदासजी