पढमेण व दोवेण व वाहिज्जंतस्स तस्स खवयस्स ।
ण कुणदि उवदेसादि समाधिकरणं अगीदत्त्थो॥443॥
सो तेण विडज्झंतो पप्पं भावस्स भेदमप्पसुदो ।
कलुणं कोलुणियं वा जायणकिविणत्तणं कुणइ॥444॥
उकवेज्ज व सहसा वा पिएज्ज असमाहिपाणयं चावि ।
गच्छेज्ज व मिच्छत्तं मरेज्ज असमाधिमरणेण॥445॥
संथारपदोसं वा णिब्भच्छिज्जंतओ णिगच्छेज्जा ।
कुव्वंते उड्डाहो णिच्चुब्भंते विकिंते वा॥446॥
क्षुधा-तृषा से पीड़ित होनेवाले क्षपक मुनीश्वर को ।
अल्पमति आचार्य समाधी-साधक शिक्षा दे न सकें॥443॥
वह अल्पज्ञ क्षपक क्षुत् पीड़ित होकर के शुभभाव तजे ।
करुण रुदन अरु करे याचना तथा दीनता प्रकट करे॥444॥
सहसा चिल्लाने लगता है पी लेता असमाधि पेय ।
प्राप्त करे मिथ्यात्व भाव को असमाधि में मरण करे॥445॥
संस्तर को दे दोष, रुदन चिल्लाने पर भर्त्सना करें ।
संघ त्याग दें या निष्कासन करें, धर्म में दोष लगे॥446॥
अन्वयार्थ : जो पंच प्रकार के आचारों में कुशल हों, वे पूर्व में कहे जो सर्व दोष, उनका अभाव करते हैं, क्षपक को एक भी दोष से लिप्त नहीं होने देते । इसलिए आचारवान ही निर्यापक गुरु होते हैं, अन्य के निर्यापक गुरुपना भी नहीं बन सकता है ।
ऐसे सुस्थित नामक सत्तरहवें अधिकार में ग्यारह गाथाओं द्वारा निर्यापक आचार्य के आचारवान गुण का वर्णन किया ।
यहाँ पर पंचाचार का वर्णन करना चाहिए, परंतु ग्रंथ के विस्तार हो जाने के भय से नहीं लिखा है । जो विशेष जानने के इच्छुक हैं, उन्हें मूलाचार ग्रन्थ से जान लेना चाहिए ।

  सदासुखदासजी