+ अब अपरिस्रावी नामक सातवाँ गुण दश गाथाओं में वर्णन करते हैं- -
लोहेण पीदमुदयं व जस्स आलोचिंदा अदीचारा ।
ण परिस्सवंति अण्णत्तो सो अप्परिस्सवो होदि॥491॥
जैसे तप्त लौह के द्वारा पिया, न जल बाहर आता ।
वैसे दोष न प्रकट किसी पर करें अपरिस्रावी आचार्य॥491॥
अन्वयार्थ : जैसे तप्तायमान लोहा, उसके द्वारा पिया गया जल बाहर नहीं दिखता है, वैसे ही जो क्षपक के द्वारा की गई दोषों की आलोचना, उन दोषों/अतिचारों को अन्य मुनीश्वरों को नहीं बतलाते/प्रगट नहीं करते, वे आचार्य अपरिस्राव गुण के धारक होते हैं ।

  सदासुखदासजी