तह्मा गणिणा उप्पीलएण खवयस्स सव्वदो साहु ।
ते उग्गालेदव्वा तस्सेव हिदं तहा चेव॥490॥
इसीलिए उत्पीड़क सूरि क्षपक मुनि के सब दोषों को ।
उगलाये क्योंकि इसमें ही क्षपक मुनि का हित होवे॥490॥
अन्वयार्थ : इसलिए अवपीडक गुण के धारक जो आचार्य हैं, उन्हें क्षपक के संपूर्ण दोष उगलवाने योग्य हैं । अत: दोषों का वमन करा देना, यही क्षपक का हित है ।
ऐसे सुस्थित नामक अधिकार में निर्यापक आचार्य के अष्टगुणों में अवपीडक नामक छठवाँ गुण बारह गाथाओं में पूर्ण किया ।

  सदासुखदासजी