+ साधु का त्याग कैसे हुआ? यह कहते हैं - -
लज्जाए गारवेण व कोई दोसे परस्स कहिदोवि ।
विप्परिणामिज्ज उधावेज्ज व गच्छाहि वा णिज्जा ॥495॥
कोई क्षपक लज्जा-गारव से कर सकता विरुद्ध परिणाम ।
दोष कथन से कुपित हुआ रत्नत्रय अथवा गण का त्याग॥495॥
अन्वयार्थ : अपने दोष प्रगट होने से/पर से कह देने से कोई साधु लज्जा से या गारव से विपरिणामी हो जाये/जुदा हो जाये । ये गुरु मुझे प्रिय नहीं, यदि मेरे गुरु होते तो मेरा दोष कैसे कहते? ये गुरु हमारे बाहर के प्राण हैं - ऐसा जो सोचा था, वह भावना आज नष्ट हो गई अथवा दोष प्रगट करने से संघ को छोडकर अन्य संघ में चले जायें अथवा रत्नत्रय का त्याग कर दें ।

  सदासुखदासजी