+ अब आत्मपरित्याग को कहते हैं- -
कोई रहस्यभेदे कदे पदोसं गवो तमायरियं ।
उद्दावेज्ज व गच्छं भिंदेज्ज वहेज्ज पडिणीओ ॥496॥
रहस्य भेद करने पर कोई द्वेषी हो गुरु को मारे ।
स्वयं विरोधी हो जाये वह अथवा संघ में भेद करे॥496॥
अन्वयार्थ : कोई साधु अपने रहस्य का भेद खुल जाने से, प्रद्वेष/वैर को धारण करके आचार्य को मारण करता है/मारता है, कोई संघ में फूट कर देता है । अहो मुनिजन! सुनो, धर्म स्नेह रहित ऐसे गुरु से क्या प्रयोजन है, जिसने हमारा अपराध जगत में प्रगट करके हमें दोषी जाहिर किया, वैसे ही तुम्हें भी दोषी जाहिर करेंगे । इस प्रकार प्रत्यनीक/वैरी हो जाते हैं ।

  सदासुखदासजी