
जाणादि मज्झ एसो सुहसीलत्तं च सव्वदोसे य ।
तो एस मे ण दाहिदि पायच्छित्तं महल्लित्ति॥607॥
जाणोद मज्झ एसाि सुहसीलत्तं च सव्वदासिि य ।
ताि एस मि ण दोहेद िायच्छित्तं महल्लिपत्त॥607॥
अन्वयार्थ : कोई पार्श्वस्थ/भ्रष्ट मुनि अपने समान पार्श्वस्थ मुनि को पाकर/मिलकर अपने दुष्कृत/दोष अतिचार कहता है कि यह मुनि भी हमारे समान सर्व व्रतादि में दोषों का संचय करने/लगाने वाला है और हमें देह में सुखियापना है तथा हमारे सर्व दोष जानते हैं; इसलिए ये मुझे महान, बडा प्रायश्चित्त नहीं देंगे, थोडा देंगेतथा हमारे आलोचना करने योग्य समस्त दोष हैं, उन सभी को भी जानते हैं । ऐसा विचार करके अपने समान कोई सदोषी मुनि उनके पास आलोचना करते हैं, वह भगवान के प्रवचन से प्रतिक्रुद्ध/प्रतिकूल - ऐसा तत्सेवी नामक आलोचना का दसवाँ दोष है ।
सदासुखदासजी