
जह कोइ लोहिदकयं वत्थं धोवेज्ज लोहिदेणेव ।
ण य तं होदि विसुद्धं तधिमा सल्लुद्धरणसोधी॥609॥
जैसे कोई रुधिर से सना वस्त्र रुधिर से ही धोये ।
किन्तु न होता वस्त्र शुद्ध वैसे ही यह आलोचन है॥609॥
अन्वयार्थ : जैसे कोई पुरुष रुधिर से लिप्त वस्त्र को रुधिर से ही धोकर उज्ज्वल करना चाहे तो रुधिर से रुधिर उज्ज्वल/साफ नहीं होता, निर्मल जल से धोने पर ही उज्ज्वल होता है । वैसे ही कोई साधु स्वयं दोषों से युक्त हो और दूसरे सदोष मुनि से आलोचना करके अपनी शल्योद्धरण शुद्धता चाहता है, वह तो कदापि शुद्ध नहीं होगा । मायाचारादि दोष तथा सूत्र की आज्ञा उल्लंघनादि महादोषों से लिप्त होगा । इसलिए वीतरागी गुरुओं की शिक्षा ग्रहण करके निर्दोष आचार्य को अपने दोष सरलचित्त पूर्वक बतला देने योग्य हैं ।
सदासुखदासजी