पवयणणिण्हवयाणं जह दुक्कडपावयं करेंताणं ।
सिद्धिगमणमइदूरं तधिमा सल्लुद्धरणसोधी॥610॥
जिन वचनों का लोप करे, जो अति दुष्कर करता है पाप ।
मुक्ति गमन अति दुष्कर उनकी, वैसे शल्य शुद्धि यह जान॥610॥
अन्वयार्थ : जैसे प्रवचन/शास्त्र/जिन-आज्ञा को छिपानेवाला - भगवान की आज्ञा का लोप करनेवाला, दुष्कर पाप करनेवाला - उनका निर्वाण गमन अति दूर है, तैसे ही सदोष मुनि से आलोचना करनेवाले के शल्योद्धरण शुद्धि अति दूर है । ऐसा आलोचना का तत्सेवी नामक दसवाँ दोष पाँच गाथाओं में कहा ।

  सदासुखदासजी