आराधणपत्तीयं खवयस्स व णिरुवसग्गपत्तीयं ।
काओसग्गो संघेण होइ सव्वेण कादव्वो॥712॥
आराधना पूर्ण हो मुनि की, उसमें कोई विघ्न न हो ।
इसी हेतु से सर्व संघ करता है कायोत्सर्ग अहो॥712॥
अन्वयार्थ : सर्व संघ के साधुजनों को क्षपक की आराधना की प्राप्ति के लिये और उपसर्गरहितता के लिए कायोत्सर्ग करना योग्य है कि इन क्षपक के उपसर्ग न हो और निर्विघ्न आराधना प्राप्त हो - ऐसे अभिप्राय से सर्वसंघ कायोत्सर्ग करते हैं ।

  सदासुखदासजी