
खामेदि तुह्म खवओत्ति कुंचओ तस्स चेव खवगस्स ।
दावेदव्वो णेदूण सव्वसंघस्स वसधीसु॥711॥
क्षपक आपसे क्षमा माँगता, निर्यापक प्रमाण देते ।
सर्व संघ की वसति में वे उसकी पीछी दिखलाते॥711॥
अन्वयार्थ : भो मुनीश्वर! जल-पानादि बिना तीन प्रकार के आहार का त्याग करने वाले क्षपक से संघ के सम्पूर्ण साधुजन, तुम उनसे क्षमा ग्रहण करो । इस प्रकार कहकर सर्वसंघ की वसतिका में क्षपक की पिच्छिका लेकर दिखाना योग्य है ।
सदासुखदासजी