अहवा समाधिहेदुं कायव्वो पाणयस्स आहारो ।
तो पाणयंपि पच्छा वोसरिदव्वं जहाकाले॥714॥
अथवा हो एकाग्र समाधि अतः पेय का ले आहार ।
शक्तिहीन होने पर यथासमय करता पानक का त्याग॥714॥
अन्वयार्थ : उसके बाद क्षपक गुरु की आज्ञा से सर्व/चार प्रकार का आहार, संघ समुदाय के बीच में त्याग करें अथवा समाधि/सावधानी के लिये पानक आहार तो करना योग्य है और शेष तीन प्रकार का आहार त्यागने योग्य है । बाद में यथायोग्य काल में पान आहार भी त्याग देना योग्य है ।

  सदासुखदासजी