भावाणुरागपेमाणुरागमज्जाणुरागरत्तो वा ।
धम्माणुरागरत्तो य होहि जिणसासणे णिच्चं॥743॥
भावाणुरागिमिाणुरागमज्जाणुरागरत्ताि वा ।
धम्माणुरागरत्ताि य हािेह ेजणसासणि ेणच्चं॥743॥
अन्वयार्थ : इस जगत में मनुष्य पर पदार्थ में अनुराग करता है, स्नेही लोगों में प्रेमानुरागी होता है, अष्ट मदों में अनुरागी है और अनादि से मोही हुआ पर में अनुराग करता है । अब यदि जिनशासन में प्रवर्तते हो तो पर पदार्थ में राग त्याग कर परमधर्म जो रत्नत्रय रूप अपना स्वभावरूप धर्म, उसके सदा अनुरागी होना । जो दर्शन से भ्रष्ट है, वह भ्रष्ट है । सम्यग्दर्शनरहित के अनंतानंत काल में भी निर्वाण नहीं होगा और जो चारित्र से भ्रष्ट है, लेकिन सम्यग्दर्शन नहीं छूटा, उसको अल्प काल में निर्वाण होगा और जिसका सम्यग्दर्शन छूट गया है, वह अनंत काल में भी सिद्ध नहीं होगा ।

  सदासुखदासजी