णगरस्स जह दुवारं मुहस्स चक्खू तरुस्स जह मूलं ।
जह जाण सुसम्मत्तं णाणचरणवीरियतवाणं॥742॥
नगर गमन में द्वार, चक्षु मुख में, अरु मूल रहे तरु में ।
वैसे सम्यग्दर्शन जानो ज्ञान चरित वीर्यादिक में॥742॥
अन्वयार्थ : जैसे नगर में प्रवेश करने का कारण द्वार है - द्वार बिना नगर में प्रवेश कैसे होगा? वैसे ज्ञान, चारित्र, तप, वीर्य - इनमें प्रवेश करने का द्वार सम्यक्त्व है । ज्ञान, चारित्रादि आत्मा के अनन्तगुण सम्यक्त्व द्वार से जीव को प्राप्त होते हैं । सम्यग्दर्शन बिना ज्ञान, चारित्र, तप, वीर्य आत्मा को प्राप्त नहीं होते । जैसे मुख की शोभा नेत्रों से है, वैसे ही ज्ञान, चारित्र, तप, वीर्य सम्यग्दर्शन से भूषित/शोभित होते हैं । जैसे वृक्ष का मूल जडें हैं, वैसे ही ज्ञान आदि का मूल सम्यग्दर्शन है ।

  सदासुखदासजी