दंसणभट्टो भट्टो ण हु भट्टो होइ चरणभट्टो हु ।
दंसणममुयंतस्स हु परिवडणं णत्थि संसारे॥745॥
दर्शन से जो भ्रष्ट, भ्रष्ट वह, चरित भ्रष्ट हैं भ्रष्ट नहीं ।
दर्शन का जो त्याग करे नहिं, वह जग में परिभ्रमे नहीं॥745॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट है, वह भ्रष्ट है, पर जो चारित्र से भ्रष्ट है, वह भ्रष्ट नहीं है । जिसका सम्यग्दर्शन नहीं छूटा, उसका संसार में पतन नहीं होता ।

  सदासुखदासजी