सुद्धे सम्मत्ते अविरदो वि अज्जेदि तित्थयरणामं ।
जादो दु सेणिगो आगमेसिं अरुहो अविरदो वि॥746॥
शुद्ध समकिति अविरति को भी, तीर्थंकर कर्मास्रव हो ।
अविरत श्रेणिक भी भविष्य में तीर्थंकर पद प्राप्त हुआ॥746॥
अन्वयार्थ : सम्यक्त्व शुद्ध हो तो व्रत रहित पुरुष भी तीर्थंकर नामकर्म का उपार्जन करता है । व्रत रहित भी श्रेणिक राजा सम्यक्त्व के प्रभाव से आगामी काल में अरहन्त (तीर्थंकर) होंगे ।

  सदासुखदासजी