+ आगम में इस विषय का ऐसा विवेचन है - -
पादोसिय अधिकरणिय कायिय परिदावणादिवादाए ।
एदे पंचपओगा किरियाओ होंति हिंसाओ॥813॥
िादािेसय एधकरेणय कोयय पिरदावणोदवादाए ।
एदि िंचिआगिा ेकपरयाआि होंेत हिंसाआि॥813॥
अन्वयार्थ : पर को इष्ट स्त्री, धन, वस्त्र, आभरण, सुन्दर भवन उनको हरण करने के लिये जो कोप करना, वह प्राद्वेषिकी क्रिया है । हिंसा का उपकरण शस्त्र, उसका समागम संचय करना, वह अधिकारिणिकी क्रिया है । दुष्टतारूप काय का प्रवर्ताना, वह कायिकी क्रिया है । दु:ख की उत्पत्ति के निमित्त जो क्रिया, वह परितापिकी क्रिया है । जो आयु, इन्द्रिय, बल का वियोग करने वाली क्रिया, वह प्राणातिपातिकी क्रिया है । ये पाँच प्रकार के प्रयोग हैं, इनसे हिंसा की क्रियायें होती हैं । ये क्रियायें मन-वचन-काय से और क्रोध, मान, माया लोभ से तथा स्पर्शन, रसन, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र - इन पंच इन्द्रियों के द्वारा होती हैं । अत: ये पाँच क्रियायें मन से भी होती हैं, वचन से भी होती हैं, काय से भी होती हैं तथा क्रोध के वशीभूत होकर होती हैं । मान, माया, लोभ के वशीभूत होकर होती हैं एवं स्पर्शनादि इन्द्रियों के वशीभूतपने के कारण भी होती हैं । उनमें जैसा मन-वचन-काय, क्रोध, मान, माया, लोभ, स्पर्शनादि इन्द्रियों की जैसी तीव्रमंदादि परिणति सहित हो, उसके सदृश-विसदृश बंध होता है ।

  सदासुखदासजी