
बाह्य वस्तु कि यागि मात्र सि शुद्ध जीव काि बन्ध कहें ।
वायु ओद का वध हानिि सि नहीं अहिंसक कािई रहि॥812॥
बाह्य वस्तु के योग मात्र से शुद्ध जीव को बन्ध कहें ।
वायु आदि का वध होने से नहीं अहिंसक कोई रहे॥812॥
अन्वयार्थ : अन्य आगम ग्रन्थों में हिंसा के विषय में ऐसा लिखा है - रागी, द्वेषी अथवा मूढ बनकर आत्मा जो कार्य करता है, उससे हिंसा होती है । प्राणी के प्राणों का वियोग तो हुआ, परन्तु रागादिक विकारों से आत्मा यदि उस समय मलिन नहीं हुआ है तो उससे हिंसा नहीं हुई है- ऐसा समझना चाहिए । वह अहिंसक ही रहा - ऐसा समझना चाहिए । अन्य जीवों के प्राणों का वियोग होने से ही हिंसा होती है - ऐसा नहीं है अथवा उनके प्राणों का नाश न होने से अहिंसा होती है - ऐसा भी नहीं समझना चाहिए, परन्तु आत्मा ही हिंसा है और वही अहिंसा है - ऐसा मानना चाहिए अर्थात् प्रमाद परिणत आत्मा ही स्वयं हिंसा है और अप्रमत्त आत्मा ही अहिंसा है । आगम में भी ऐसा कहा है । आत्मा ही हिंसा है और आत्मा ही अहिंसा है - ऐसा जिनागम में निश्चय किया है । अप्रमत्त/प्रमादरहित आत्मा को अहिंसक कहते हैं और प्रमादसहित आत्मा को हिंसक कहते हैं । जीवों के परिणामों के आधीन बन्ध होता है, जीव का मरण हो अथवा न हो, परिणामों के वश हुआ आत्मा कर्म से बद्ध होता है । ऐसा निश्चय नय से जीव के बन्ध का संक्षेप में स्वरूप कहा है । जीव, उसके शरीर, शरीर की उत्पत्ति जिसमें होती है - ऐसी योनि, इनके स्वरूप जानकर और उसके उत्पत्ति का काल जानकर पीडा का परिहार करने वाला और लाभ, सत्कारादि की अपेक्षा न करके तप करने वाला जीव अहिंसक माना जाता है । आगम में इस विषय का ऐसा विवेचन है - ज्ञानी पुरुष कर्म क्षय करने के लिये उद्यत होते हैं, वे हिंसा के लिये उद्यत नहीं होते हैं । उनके मन में शठ भाव, मायाभाव नहीं रहता, वे अप्रमत्त रहते हैं । इसलिये वे अबंधक- अहिंसक माने गये हैं । जिसके शुभ परिणाम हैं - ऐसे आत्मा के शरीर से यदि अन्य प्राणी के प्राणों का वियोग हुआ और वियोग होने मात्र से यदि बन्ध होगा तो किसी को भी मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी, क्योंकि योगियों को भी वायुकायिक जीवों के वध के निमित्त से कर्मबन्ध होता है - ऐसा मानना पडेगा । इस विषय में शास्त्र में ऐसा लिखा है । यदि राग-द्वेष रहित आत्मा को भी बाह्य वस्तु के सम्बन्ध से बन्ध होगा तो जगत में कोई भी अहिंसक नहीं है - ऐसा मानना पडेगा अर्थात् शुद्ध मुनि को भी वायुकायिक जीव के बन्ध के लिये हेतु समझना होगा, इसलिए निश्चयनय के आश्रय से दूसरे प्राणी के प्राणों का वियोग होने पर भी अहिंसा में बाधा नहीं आती है - ऐसा समझना चाहिए ।
सदासुखदासजी