
जीवगदमजीवगदं समासदो होदि दुविहमधिकरणं ।
अट्ठुत्तरसयभेदं पढमं विदियं चदुब्भेदं॥816॥
हिंसा के अधिकरण कहे दो प्रथम जीवगत इक शत आठ ।
भेदरूप, एवं अजीवगत कहा दूसरा चार प्रकार॥816॥
अन्वयार्थ : हिंसा का अधिकरण/आधार संक्षेप में दो प्रकार का होता है । एक जीवगत और दूसरा अजीवगत । उसमें जीवगत आधार के एक सौ आठ भेद हैं और अजीवगत आधार के चार भेद हैं ।
सदासुखदासजी