पं-सदासुखदासजी
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अब जीवगत आधार के एक सौ आठ भेद कहते हैं-
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संरंभसमारंभारंभं जोगेहिं तह कसाएहिं ।
कदकारिदाणुमोदेहिं तहा गुणिदा पढमभेदा॥817॥
समारम्भ संरम्भारम्भ तीन योग अरु चार कषाय ।
कृत-कारित-अनुमोदन गुणा करें तो भेद एक सौ आठ॥817॥
सदासुखदासजी