
कक्कस्सवयणं णिट्ठुरवयणं पेसुण्णहासवयणं च ।
जं किंचि विप्पलावं गरहिदवयणं समासेण॥836॥
कर्कश निष्ठुर वचन तथा जो कहे अन्य के दोष वचन ।
हास्यादिक बकवाद वचन ये गर्हित है संक्षेप कथन॥836॥
अन्वयार्थ : यहाँ गर्हितवचन को संक्षेप में कहते हैं । कर्कशवचन तथा निष्ठुरवचन, पैशून्यवचन, हास्यवचन और भी जो वाचालपने से प्रलाप करना, वह गर्हितवचन है । उनमें तू मूर्ख है! तू बैल है! तू ढाँढा/ढोर है! रे मूर्ख! तू जरा भी नहीं जानता! इत्यादि संताप को उत्पन्न करनेवाले वचन, वे कर्कश वचन हैं । कोई ऐसा कहे - मैं तुझे मार डालूँगा! तेरा मस्तक/सिर छेद डालूँगा । तेरी नाक काट डालूँगा । तेरे नेत्र निकाल लूँगा । तुझे बहुत बुरी ताडना देकर बेहाल करूँगा तथा कराऊँगा, इत्यादि निष्ठुरवचन की जाति है । पर के दोष पीठ पीछे झूठे-सच्चे प्रगट करना तथा जिस वचन से पर के जीवन-धनादि का नाश हो जाये या जगत में निंद्य हो जाये, कलंक लग जाये, अपवाद हो जाये, वह सभी पैशून्य नामक गर्हितवचन है । जो हास्यपूर्वक वचन तथा भंड वचन, अपने को और पर को कुशील में राग उत्पन्न कराने वाले वचन तथा सम्पूर्ण सभावासियों के परिणाम जिन वचनों से रागभाव की उत्कृष्टता/तीव्रता को प्राप्त हो जायें, वे हास्यवचन हैं और जो वृथा बकवाद सहित प्रयोजनरहित जैसे-तैसे विचाररहित, अतिवाचालता सहित जो वचन, वे विप्रलाप नामक गर्हितवचन हैं ।
सदासुखदासजी