
जत्तो पाणवधादी दोसा जायंति सावज्जवयणं च ।
अविचारित्ता थेणं थेणत्ति जहेवमादीयं॥837॥
प्राणघात का महादोष हो जिनसे वे सावद्य वचन ।
बिना विचारे कहे चोर को चोर यही इत्यादि कथन॥837॥
अन्वयार्थ : जिस वचन से वन में अग्नि लग जाये, गाँव जल जायें, घर में अग्नि लग जाये या कलह-विसंवाद प्रगट हो जाये तथा युद्ध हो जाये, मारना-मरना होने लग जाये, छह काय के जीवों का घात हो जाये, महा आरंभ में प्रवृत्ति हो जाये, वे सभी सावद्यवचन हैं । जैसे बिना विचारे किसी पुरुष को 'ये चोर है..ये चोर है' इत्यादि कहना, यह सावद्यवचन है ।
सदासुखदासजी