+ अब चौबीस गाथाओं में अचौर्य नामक व्रत के उपदेश का वर्णन करते हैं- -
मा कुणसु तुमं बुद्धिं बहुमप्पं वा परादियं घेत्तंु ।
दंतंतरसोधणयं कलिंवमेत्तं पि अविदिण्णं॥859॥
पर की बहुत-अल्प भी वस्तु लेने का न विचार करो ।
मैल शोधने को दाँतों का तिनका भी मत ग्रहण करो॥859॥
अन्वयार्थ : भो साधो! बिना दिया पर का अल्प द्रव्य या अधिक द्रव्य दाँतों की संधि को शोधने का तृणमात्र का भी ग्रहण करने की इच्छा - भावना नहीं करना ।

  सदासुखदासजी