
एदेसिं दोसाणं मुक्को होदि अलिआदि वविदोसे ।
परिहरमाणो साधू तव्विवरीदे य लभदि गुणे॥858॥
जो असत्य वचनादिक दोषों का करता है त्याग अहो ।
इन दोषों से मुक्त रहे वह इनसे उल्टे गुण सब हों॥858॥
अन्वयार्थ : असत्यवचनादि दोषों का त्याग करनेवाला साधु वह जो ये असत्यवचन के दोष कहे, उनसे रहित होता है और इन दोषों से विपरीत गुण उन्हें प्राप्त होते हैं ।
ऐसे अनुशिष्टि नामक महाधिकार में सत्य महाव्रत की शिक्षा तीस गाथाओं में वर्णन की ।
सदासुखदासजी