
एवं जं जं पस्सदि दव्वं अहिलसदिं पाविदुं तं तं ।
सव्वजगेण वि जीवो लोभाइट्ठो ण तिप्पेदि॥861॥
वैसे नर जिस-जिसको देखे उसे प्राप्त करना चाहे ।
लोभ ग्रस्त नर पूर्ण जगत को पाकर भी सन्तुष्ट न हो॥861॥
अन्वयार्थ : जैसे धाप्या/खूब भरा हुआ पेट होने पर भी बन्दर दूर के वृक्ष पर लगे हुए लाल पके फलों को देखकर ग्रहण करने के लिए दौडता है और उन्हें ग्रहण करके फेंक देता/छोड देता है, भक्षण नहीं करता है तो भी पके फल को देखकर ग्रहण किये बिना नहीं रहता, वैसे ही लोभाविष्ट जीव भी जिस-जिस वस्तु को देखता है, सुनता है, उसे ग्रहण करने की, प्राप्त करने की अभिलाषा करता है और जगत के सर्व पदार्थ मिल जायें तो भी उसे तृप्ति नहीं होती ।
सदासुखदासजी