जह मारुवो पवट्टइ खणेण वित्थरइ अब्भयं च जहा ।
जीवस्स तहा लोभो मंदो वि खणेण वित्थरइ॥862॥
मन्द वायु क्षण भर में फैले, मेघ व्याप्त होते नभ में ।
त्यों थोड़ा भी लोभ जीव का बढ़ जाता है क्षण भर में॥862॥
अन्वयार्थ : जैसे मन्द पवन भी एक क्षणमात्र में ऐसी बढ जाती है कि सम्पूर्ण आकाश में फैल जाती है, वैसे ही मन्द लोभ भी ऐसा बढता है कि क्षणमात्र में सारे जगत की संपदा ग्रहण करने के लिए व्याप जाता है ।

  सदासुखदासजी