ते तारिसया माणाओमत्थिज्जंति दुट्ठमहिलाहिं ।
जह अकंुसेण णिस्साइज्जइ हत्थी अदिबलो वि॥947॥
लेकिन एेसा अहंकार भी दुष्ट नारियों द्वारा नष्ट ।
ज्यों अंकुश से अति बलशाली हाथी भी हो जाता वश॥947॥
अन्वयार्थ : इस जगत में पुरुषों को "उच्च कुल में उत्पन्न होने से, शरीर के बल से अथवा राज्य, सेना, सुभट, परिकर के लोगों के बल से, धन, सम्पदा, आजीविका से" भी पर्वत समान बडा अभिमान होता है । कैसा है अभिमान? बडे बलवानों से भी जिसमें क्षोभ उत्पन्न न हो, पर्वत समान सारे जगत के लोगों को प्रगट प्रकाश में आ रहा है - ऐसा अभिमानी दुष्ट स्त्रियों के संयोग से मथा जाता है, बिगड जाता है । जैसे अति बलवान हाथी भी अंकुश द्वारा बैठाया जाता है ।

  सदासुखदासजी