सोगस्स सरी वेरस्स खणी णिवहो वि होइ कोहस्स ।
णिचओ णियडीणं आसवो य महिला अकित्तीए॥989॥
नदी शोक की, खान बैर की, पुंज क्रोध, माया का ढेर ।
अपयश का आश्रय है नारी, इत्यादिक दोषों का ढेर॥989॥
अन्वयार्थ : जगत में जितना कलह है, वह स्त्रियों के निमित्त से होता है, इसलिए स्त्री कलह का स्थान है तथा सम्पूर्ण असत्य इसमें बसते हैं, इससे यह स्त्री असत्य का स्थान है । यह स्त्री अविनय का आवास है । इसमें रागी पुरुष पिता की, उपाध्याय की शिक्षा ग्रहण नहीं करता, अत: अविनय का स्थान है । खेद को अवकाश देने वाली है । कलह का मूल है, इस बिना कलह की उत्पत्ति नहीं होती तथा यह शोक की नदी है, वैर की खान है, क्रोध का पंुज है, मायाचार का समूह है और अपकीर्ति का आश्रय है ।

  सदासुखदासजी