तह्मा सा पल्लवणा पउरा महिलाण होदि अधिकिच्चा ।
सीलवदीओ भणिदे दोसे किहणाम पावंति॥1008॥
अतः यहाँ जो दोष कहे, यह है नारी-सामान्य कथन ।
शीलवती नारी में कैसे हो सकते ये दोष महान॥1008॥
अन्वयार्थ : सर्व ही जीव मोह के उदय से कुशील से मलिन होते हैं और मोह का उदय स्त्रीपुरुषों के समान होता है, इसलिए यह कथन बहुत प्रकार स्त्रियों को आश्रय करके किया है और जो शीलव्रत धारण करने वाली स्त्रियाँ हैं, उनको पूर्व में कहे दोष तो कैसे प्राप्त होंगे? जो मोह के वशीभूत हैं, उन स्त्री-पुरुषों के ये सर्व दोष जानना, मोहरहित कभी भी दोषों को प्राप्त नहीं होते । ऐसे ब्रह्मचर्य नामक महाव्रत के वर्णन में स्त्रीकृत दोषों का पैंसठ गाथाओं में वर्णन किया ।

  सदासुखदासजी