मोहोदयेण जीवो सव्वो दुस्सीलमइलिदो होदि ।
सो पुण सव्वो महिला पुरिसाणं होइ सामण्णो॥1007॥
मोह-उदय से सभी जीव होते कुशील से मलिन अरे ।
नर-नारी में है समान यह मोह कर्म का उदय खरे॥1007॥

  सदासुखदासजी