वमिदा अमेज्झमज्झे मासंपि समक्खमच्छिदो पुरिसो ।
होदि हु विहिंसणिज्जो जदि वि सय णीयल्लओ होज्ज॥1019॥
वेमदा अमज्झिमज्झि मासंेि समक्खमच्छिदाि िुपरसाि ।
हािेद हु ेवहिंसपणज्जाि जेद ेव सय णीयल्लआि हाज्जि॥1019॥
अन्वयार्थ : वमन और विष्टा के बीच रहने वाला पुरुष ग्लानि करने योग्य कैसे नहीं होगा? यद्यपि आपका अति प्रिय हितु बांधव भी क्यों न हो, घृणा करने योग्य ही है । ऐसा तीन गाथाओं में क्षेत्र की अशुचिता का वर्णन किया ।

  सदासुखदासजी