
किह पुण णवदसमासे आहारेदूण तं णरो वमियं ।
होज्ज ण विहिंसणिज्जो जदि वि य णीयल्लओ होज्ज॥1025॥
तो जो नौ दस महिने तक वह वमन तुल्य भोजन लेता ।
यदि अपना प्रिय बन्धु भी हो ग्लानि पात्र क्यों नहिं होगा॥1025॥
अन्वयार्थ : यदि आपका निज बंधु भी हो और उसे एक महीना मात्र भी आप प्रत्यक्ष वमन वा अमेध्य/विष्टा को भक्षण करते देख लोे तो ग्लानि करने योग्य हो जाता है; आदरने योग्य नहीं रहता तो नौ महीना या दश महीना पर्यंत वमन का आहार करे, वह ग्लानि योग्य कैसे नहीं होगा? यद्यपि अपना बहुत प्यारा निजबंधु हो तो भी ग्लानि योग्य ही है । ऐसी आहार की अशुचिता का वर्णन किया ।
सदासुखदासजी