+ अब शरीर के जन्म को दो गाथाओं में कहते हैं- -
असुचिं अपेच्छणिज्जं दुग्गंधं मुत्तमोणियदुवारं ।
वोत्तुं वि लज्जणिज्जं पोट्टमहं जम्मभूमी से॥1026॥
असुचिं अिच्छिपणज्जं दुग्गंधं मुत्तमापिणयदुवारं ।
वात्तिुं ेव लज्जेणज्जं िाट्टिमहं जम्मभूमी सि॥1026॥
अन्वयार्थ : जो उदर का मुख है, वह इस देह की जन्मभूमि है । वह उदर का मुख कैसा है? महान् अशुचि है, देखने योग्य नहीं है, दुर्गंधमय है, मल और रुधिर निकलने का द्वार है और मुख से नाम लेने में बहुत लज्जा आती है । ऐसा उदर का मुख जन्मभूमि भी महान अशुचि है । यदि अभी अन्य किसी के मुख की वास/रुधिर-मांस से भरा जाल के समान प्राणी को आच्छादन/ ढकने वाली थैली को छूने से, देखने से ही महाग्लानि आती है तो आलिंगन किया गये योनिमुख तथा जरायुपटल में बसना ग्लानियोग्य कैसे नहीं होगा? ऐसी जन्मभूमि की अशुचिता कही ।

  सदासुखदासजी